LoginMembership has its privileges. Choose a username and provide a working email - that's all it takes to join. Click below to make a new account.Related Links+ बड़े काम की है नेट पर अड्डेबाजी+ Also by ugesh srakar
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Baddai Kamm Ki Hai Net Pe AddaiBazzi !By ugesh srakar, Section Information ग्लोबल मंदी के इस दौर में जब लोगों की नौकरियां जा रही हैं और इसके चलते वे भारी तनाव का सामना कर रहे हैं, सोशल नेटवर्किंग साइट संजीवनी का काम कर रही हैं। न सिर्फ इन पर मौजूद फ्रेंड्स आपस में एक-दूसरे की तकलीफ बांट रहे हैं, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी मुहैया करा रहे हैं। सोशल सर्कल और दोस्ती बढ़ाने से शुरू हुईं ये वेबसाइट्स अब जॉब पोर्टल का काम भी बखूबी कर रही हैं। यानी दोस्ती, प्रेम, शादी से लेकर कारोबार तक, तमाम ऑप्शन उपलब्ध हैं सोशल वेबसाइट्स पर।एक जैसी रुचियों और पसंद वाले लोगों को एक प्लैटफॉर्म पर लाने के लिए शुरू हुई ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग अब कम्यूनिकेट करने और जानकारियां शेयर करने का सबसे सुविधाजनक, सस्ता और आसान जरिया बन गई है। दुनिया में करोड़ों लोग सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से जुड़े हुए हैं और इनमें रोजाना हजारों-लाखों नए नाम जुड़ रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के इस बढ़ते नेटवर्क पर आईटी कंपनी क्यूबिट टेक्नॉलजी के एमडी संजय शर्मा कहते हैं कि टेक्नॉलजी को आप रोक नहीं सकते और न रोकना चाहिए। वह सोशल नेटवर्किंग साइट्स की तुलना टीवी से करते हुए कहते हैं कि जिस वक्त टीवी शुरू हुआ, गिने-चुने चैनल और प्रोग्रैम थे लेकिन आज सैकड़ों ऑप्शन हैं। ऐसे में आप क्या चुनते हैं, यह आप पर निर्भर करता है। इसी तरह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की भी बाढ़ आ गई है। लेकिन इनका इस्तेमाल आप अपने फायदे के लिए किस तरह करते हैं, यह आप पर निर्भर करता है। वह जोर देकर कहते हैं कि ये वेबसाइट्स आपको प्रफेशन में आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकती हैं। प्रफेशनल यूज भी : असल में, इन दिनों सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स ढेर सारे प्रफेशन और कमर्शल ऑप्शन उपलब्ध करा रही हैं। इन पर नौकरियों और कारोबार से जुड़े न सिर्फ विज्ञापन हैं, बल्कि लोग एक-दूसरे को सीधे अवसरों की जानकारी मुहैया कराते हैं। जिन्हें अवसर की तलाश है, वे भी यहां मौजूद हैं और जिनके पास अवसर या उससे जुड़ी जानकारी हैं, वे भी यहां हैं। सीधा संपर्क होने की वजह से यहां बननेवाले प्रफेशनल संबंध ज्यादा सटीक और गहरा होते हैं। फिर जितने ज्यादा मेंबर, उतने ही अवसर भी ज्यादा मिलते हैं। ये तमाम चीजें मिलकर एक मजबूत मार्किटिंग सिस्टम तैयार करती हैं, जो आपके ब्रैंड, प्रॉडक्ट और सर्विस को प्रमोट करता है।
वेबसाइट्स पर मौजूद तमाम लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं और जानकारियां शेयर कर रहे हैं। 'इकॉनमिस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक पर एक प्रफाइल से औसतन 120 फ्रेंड जुड़े हैं, जबकि किसी-किसी के 500 फ्रेंड भी हैं। यानी ऑनलाइन दोस्तों की तादाद खासी है। हालांकि ज्यादातर मामलों में यह दोस्ती पक्की नहीं है क्योंकि 'इकॉनमिस्ट' का कहना है कि लोग ऑनलाइन बेशक दोस्त काफी बना लेते हैं, लेकिन रेग्युलर संपर्क में कम ही लोगों के रहते हैं। औसतन एक शख्स 7 लोगों के पोस्ट का ही जवाब देता है। महिलाएं ज्यादा सोशल हैं और वे एक पोस्ट पर औसतन 10 लोगों तक को जवाब देती हैं। दोतरफा कम्यूनिकेशन यानी ईमेल या चैटिंग में यह संख्या घटकर चार रह गई।
बहरहाल, दोस्त कितने भी हों, लेकिन ऑनलाइन दोस्ती की यह दुनिया ज्यादा खुली और लोकतांत्रिक समझी जाती है। इस प्लैटफॉर्म पर मौजूद लोग एक-दूसरे की पसंद-नापसंद, खासियतें आदि से आसानी से रूबरू हो सकते हैं। जनरल के अलावा म्यूजिक, ट्रैवल, आर्ट, मूवीज़, बिज़नस, एजुकेशन, मेडिकल से लेकर सामाजिक मुद्दों तक से संबंधित सोशल नेटवर्किंग साइट्स हैं। इन साइट्स पर मौजूद जानकारी से पुलिस को केस सुलझाने में भी मदद मिल रही है तो लोग इनका इस्तेमाल किसी मुद्दे पर आवाज उठाने के लिए भी कर रहे हैं। मसलन, चर्चित आरुषि मर्डर केस में ऑर्कुट पर मौजूद उसके प्रफाइल से पुलिस ने काफी जानकारी जुटाई तो ऑनलाइन कम्यूनिटी के जरिए आरुषि के दोस्तों ने इंसाफ के लिए आवाज बुलंद की। रीयूनियन डॉट कॉम दोस्तों और परिजनों को मिलाने में मददगार साबित हो रही है और इसके करीब 5 करोड़ मेंबर हैं। तेजी से बढ़ता बाजार: सबसे ज्यादा डिमांड जनरल वेबसाइट्स की है। इन साइट्स का इस्तेमाल करनेवाले लोगों की संख्या से यह अनुमान सहज लगाया जा सकता है। दुनिया भर में सबसे ज्यादा माईस्पेस के करीब 25 करोड़ यूजर हैं। दूसरे नंबर पर 17.5 करोड़ यूजर के साथ फेसबुक है, जबकि भारत, पाकिस्तान, ब्राजील, पेरेग्वे आदि में पॉप्युलर ऑर्कुट के कुल 6.7 करोड़ यूजर हैं। टैग्ड डॉट कॉम पर 7 करोड़ और अंगोला, पुर्तगाल, रोमानिया, थाइलैंड, लैटिन अमेरिका आदि में चर्चित हाई फाइव पर 8 करोड़ मेंबर रजिस्टर्ड हैं। यूरोप में सबसे ज्यादा पॉप्युलर नेटलॉग है, जिसके कुल 4.2 करोड़ सदस्य हैं। बात अगर अपने मुल्क की करें, तो यहां ऑर्कुट के 1.2 करोड़ और फेसबुक के 40 लाख मेंबर हैं। भारत में इन साइट्स के बढ़ते प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते एक साल में 51 फीसदी का इजाफा होकर इनके यूजर्स की संख्या एक करोड़ से बढ़कर 5.1 करोड़ हो गई है। इनमें भी पूरी तरह भारतीय साइट भारतस्टूडेंट्स 2337;ॉटकॉम 88 फीसदी की दर से बढ़ रही है। इसके अलावा आईटाइम्स, पावरपीयर्स, बिग अड्डा आदि भी तेजी से पॉप्युल हो रही हैं। टाइम्स इंटरनेट के चीफ एडिटर राजेश कालरा कहते हैं कि दुनिया भर में पसरे आर्थिक मंदी के माहौल का सबसे ज्यादा फायदा सोशल नेटवर्किंग साइट्स को मिल रहा है। वह कहते हैं कि अभी हम शुरुआती स्टेज में हैं लेकिन भारत में इन साइट्स का भविष्य काफी अच्छा है, क्योंकि हम आईटी में काफी सक्षम हैं। कैसे हुई शुरुआत : थोड़ा पीछे जाकर देखें तो 90 के दशक के मध्य में ही ऑनलाइन कम्यूनिटी के रूप में सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत हो गई थी। इस काम को अंजाम देनेवाली वेबसाइट थीं: जियोसाइट्स, ट्राइपोड और दग्लोबल डॉट कॉम। इनके जरिए कुछ ऑनलाइन कम्यूनिटीज ने उस वक्त चैटरूम के जरिए पर्सनल जानकारी और आइडिया शेयर करना शुरू किया। इनमें क्लासमेट्स और सिक्सडिग्री जैसे नाम प्रमुख थे। 2002-04 के बीच माइ स्पेस, बेबो और फ्रेंड्स्टर बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के रूप में सामने आए। इस बीच, साइट्स के जरिए लोगों के बीच कनेक्टिविटी और कंटेंट पर भी ज्यादा जोर दिया जाना लगा। लेकिन असली रिवोल्यूशन आया 2004 में ऑर्कुट और फेसबुक से। इन्होंने तेजी से पैर पसारे और सोशल नेटवर्किंग के काफी बड़े हिस्से पर काबिज हो गईं। यूजर इन तमाम चीजों के बारे में जागरुक हो रहा है और इसका फायदा भी उठाना चाहता है। यही वजह है कि इन दिनों बिज़नस के लिहाज से सबसे चर्चित लिंक्डइन वेबसाइट ने थोड़े ही वक्त में 200 देशों में करीब 3.6 करोड़ यूजर तैयार कर लिए हैं। इस साइट से रोजाना लाखों नए यूजर जुड़ रहे हैं। लिंक्डइन का दावा है कि फॉच्यून 500 कंपनियों से यूजर यहां मौजूद पर हैं। जाहिर है, ऐसे में यहां ऑप्शन की कोई कमी नहीं है। बिज़नस की दुनिया में सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बढ़ती भूमिका को समझते हुए ही माइक्रोसॉफ्ट ने फेसबुक से 24.8 करोड़ डॉलर का करार किया है। इसके तहत इस साइट पर 2011 तक माइक्रोसॉफ्ट के विज्ञापन दिए जाएंगे। तस्वीर का दूसरा रुख : इन तमाम फायदों के बीच सोशल नेटवर्किंग के कुछ नकारात्मक पहलू भी सामने आए हैं। यहां मौजूद जानकारियां कई बार घातक साबित हुई हैं। मसलन, 2007 में मुंबई का अदनान पटरावाला केस, जिसमें यह साबित हुआ कि सोशल नेटवर्किंग साइट ऑर्कुट पर बने कथित दोस्त ही इस किशोर के अपहरण और हत्या की वजह बने। इस मामले ने इन वेबसाइट्स पर मौजूद जानकारियों के बेजा इस्तेमाल पर कड़े सवाल खड़े किए। इसी तरह का एक मामला आया था, 2006 में अमेरिका में। माइ स्पेस पर फर्जी प्रफाइल के जरिए छींटाकशी से परेशान एक अमेरिकी किशोरी ने खुदकुशी कर ली। फर्जी प्रफाइल के जरिए धांधलेबाजी के अलावा साइबर क्राइम के मामले कई बार सामने आते रहे हैं। इसके अलावा, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के एडिक्ट होने और इसके गलत यूज पर भी समाजशास्त्री व सायकॉलजिस्ट चिंता जताते रहे हैं। समाजशास्त्री इम्तियाज अली कहते हैं कि इंटरनेट एक माध्यम है। इसका सही और गलत दोनों ही तरह से इस्तेमाल हो सकता है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लोग मिलते हैं, मेलजोल बढ़ता है और सर्कल बढ़ता है। लेकिन कई बार गलत लोगों के चक्कर में भी पड़ सकते हैं। ऐसे में अपने बारे में कोई भी जानकारी देने या किसी से भी दोस्ती व कारोबार बढ़ाने से पहले सोच-समझ लें। लेकिन असल दिक्कत यही है कि यहां मौजूद जानकारी के सही या गलत होने के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। कई लोग यहां गलत जानकारी देकर सामने वाले का फायदा उठा रहे हैं। यहां तक कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए बन रहे क्षणिक रिश्ते आपस में कड़वाहट और परेशानी भी पैदा कर रहे हैं। सीनियर सायकायट्रिस्ट समीर मल्होत्रा कहते हैं कि ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग नए तरह के तनाव और रिश्तों के बिखराव पैदा कर रही है। कई बार सामने वाले के बारे में बिना जाने ही रिलेशनशिप गहरी हो जाती है और दोनों लोगों के बीच इमोशनल बॉन्डिंग बन जाती है। ऐसे में टकराव या रिश्तों का बिखराव सामने आता है, जो तनाव पैदा करता है। वह जोर देकर कहते हैं कि कई बार बच्चे भी इनके जरिए गलत कामों की ओर मुड़ जाते हैं या गलत हाथों में पड़ जाते हैं। यह ससायटी के लिए चिंताजनक है। इन तमाम बातों के अलावा, सोशल नेटवर्किंग साइट्स अभी तक व्यक्तिगत या कारोबारी संबंधों के लिए ही ज्यादा काम कर पा रही हैं। समाज की बेहतरी के लिए ये ज्यादा योगदान नहीं दे पा रही हैं। हालांकि चैरिटी से संबंधित सोशल नेटवर्किंग साइट सोशलवाइब से 4.3 लाख लोग जुड़े हैं, लेकिन सोशल या एनवायरनमंट मुद्दों से संबंधित साइट्स को अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिल रहा है। वाइजरअर्थ के साथ भी महज 20 हजार लोग जुड़े हैं तो वनवर्ल्ड को भी अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला है। पर्सनल और प्रफेशनल रिश्तों को मजबूत बना रहीं ये वेबसाइट्स जागरूकता फैलाने और समाज की भलाई में भी योगदान दे सकती हैं। इस दिशा में अभी कुछ खालीपन है।
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